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वन पर्व
अध्याय ३१
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द्रौपद्यु उवाच
व्राह्मणाः सर्वकामैस्ते सततं पार्थ तर्पिताः |  ११   क
यतय़ो मोक्षिणश्चैव गृहस्थाश्चैव भारत ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति