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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स्वगोचरे न्यस्य मनो वुद्धीन्द्रिय़ाणि च |  १०   क
स्मितपूर्वमुवाचेदं भगवान्वासवानुजः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति