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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
श्रुत्वैतद्धर्मराजस्य वचनं मधुसूदनः |  ३१   क
पार्श्वस्थं सात्यकिं प्राह रथो मे युज्यतामिति ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति