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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
सात्यकिस्तूपनिष्क्रम्य केशवस्य समीपतः |  ३२   क
दारुकं प्राह कृष्णस्य युज्यतां रथ इत्युत ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति