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शान्ति पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
इन्द्रिय़ाणि मनश्चैव वुद्धौ संवेशितानि ते |  ४   क
सर्वश्चैव गणो देव क्षेत्रज्ञे ते निवेशितः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति