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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
तमेकं रथवंशेन महता पर्यवारय़न् |  ४३   क
विकर्षन्तश्च चापानि विसृजन्तश्च साय़कान् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति