आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ४६

व्रह्मो उवाच

गृहस्थो व्रह्मचारी च वानप्रस्थोऽथ वा पुनः |  १७   क
य इच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमां वृत्तिमाश्रय़ेत् ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति