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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
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व्रह्मो उवाच
न संनिकाशय़ेद्धर्मं विविक्ते विरजाश्चरेत् |  ३१   क
शून्यागारमरण्यं वा वृक्षमूलं नदीं तथा |  ३१   ख
प्रतिश्रय़ार्थं सेवेत पार्वतीं वा पुनर्गुहाम् ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति