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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ४६
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व्रह्मो उवाच
निराशीः सर्वभूतेषु निरासङ्गो निराश्रय़ः |  ४४   क
सर्वज्ञः सर्वतो मुक्तो मुच्यते नात्र संशय़ः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति