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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
वृथा सन्तोषितो वह्निः खाण्डवे सव्यसाचिना |  ११   क
उपकारमजानन्स कृतघ्न इति मे मतिः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति