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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
यत्रादहत्स भगवान्मातरं सव्यसाचिनः |  १२   क
कृत्वा यो व्राह्मणच्छद्म भिक्षार्थी समुपागतः |  १२   ख
धिगग्निं धिक्च पार्थस्य विश्रुतां सत्यसन्धताम् ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति