आश्रमवासिक पर्व  अध्याय ४६

युधिष्ठिर उवाच

मन्ये पृथा वेपमाना कृशा धमनिसन्तता |  १६   क
हा तात धर्मराजेति समाक्रन्दन्महाभय़े ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति