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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
दुर्विज्ञेय़ा हि गतय़ः पुरुषाणां मता मम |  २   क
यत्र वैचित्रवीर्योऽसौ दग्ध एवं दवाग्निना ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति