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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
सूतमागधसङ्घैश्च शय़ानो यः प्रवोध्यते |  ५   क
धरण्यां स नृपः शेते पापस्य मम कर्मभिः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति