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सभा पर्व
अध्याय ४६
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जनमेजय़ उवाच
के च तत्र सभास्तारा राजानो व्रह्मवित्तम |  २   क
के चैनमन्वमोदन्त के चैनं प्रत्यषेधय़न् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति