वन पर्व  अध्याय २८

वैशम्पाय़न उवाच

चतुर्णामेव पापानामश्रु वै नापतत्तदा |  ७   क
त्वय़ि भारत निष्क्रान्ते वनाय़ाजिनवाससि ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति