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वन पर्व
अध्याय १६७
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अर्जुन उवाच
आच्छिद्य रथपन्थानमुत्क्रोशन्तो महारथाः |  २   क
आवृत्य सर्वतस्ते मां शरवर्षैरवाकिरन् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति