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वन पर्व
अध्याय ४६
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जनमेजय़ उवाच
अत्यद्भुतमिदं कर्म पार्थस्यामिततेजसः |  १   क
धृतराष्ट्रो महातेजाः श्रुत्वा विप्र किमव्रवीत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति