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वन पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
घृणी कर्णः प्रमादी च आचार्यः स्थविरो गुरुः |  १०   क
अमर्षी वलवान्पार्थः संरम्भी दृढविक्रमः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति