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वन पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
अपि वा रथघोषेण भय़ार्ता सव्यसाचिनः |  १७   क
प्रतिभाति विदीर्णेव सर्वतो भारती चमूः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति