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वन पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
यदुद्वपन्प्रवपंश्चैव वाणा; न्स्थातातताय़ी समरे किरीटी |  १८   क
सृष्टोऽन्तकः सर्वहरो विधात्रा; भवेद्यथा तद्वदपारणीय़ः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति