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वन पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
शक्रलोकगतं पार्थं श्रुत्वा राजाम्विकासुतः |  २   क
द्वैपाय़नादृषिश्रेष्ठात्सञ्जय़ं वाक्यमव्रवीत् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति