वन पर्व  अध्याय ४६

सञ्जय़ उवाच

नैतदुत्सहतेऽन्यो हि लव्धुमन्यत्र फल्गुनात् |  २५   क
साक्षाद्दर्शनमेतेषामीश्वराणां नरो भुवि ||  २५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति