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वन पर्व
अध्याय ४६
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धृतराष्ट्र उवाच
ममापि वचनं सूत न शुश्रूषति मन्दभाक् |  ३४   क
दृष्ट्वा मां चक्षुषा हीनं निर्विचेष्टमचेतनम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति