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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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सञ्जय़ उवाच
इत्येवमुक्तस्तु जनार्दनेन; पार्थः प्रशस्याथ सुहृद्वधं तम् |  ७२   क
ततोऽव्रवीदर्जुनो धर्मराज; मनुक्तपूर्वं परुषं प्रसह्य ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति