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विराट पर्व
अध्याय ४६
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अश्वत्थामो उवाच
आचार्य एव क्षमतां शान्तिरत्र विधीय़ताम् |  १२   क
अभिषज्यमाने हि गुरौ तद्वृत्तं रोषकारितम् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति