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स्वर्गारोहण पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
किं नु सुप्तोऽस्मि जागर्मि चेतय़ानो न चेतय़े |  ४८   क
अहो चित्तविकारोऽय़ं स्याद्वा मे चित्तविभ्रमः ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति