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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ३२
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वैशम्पाय़न उवाच
कुन्तीसमीपे पुरुषोत्तमौ तु; यमाविमौ विष्णुमहेन्द्रकल्पौ |  ८   क
मनुष्यलोके सकले समोऽस्ति; यय़ोर्न रूपे न वले न शीले ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति