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कर्ण पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
यश्च गाण्डीवमुक्तानां स्पर्शमुग्रमचिन्तय़न् |  ८०   क
अपतिर्ह्यसि कृष्णेति व्रुवन्पार्थानवैक्षत ||  ८०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति