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वन पर्व
अध्याय २४२
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र कञ्चित्प्रय़ातं तु दूतं दुःशासनोऽव्रवीत् |  ७   क
गच्छ द्वैतवनं शीघ्रं पाण्डवान्पापपूरुषान् |  ७   ख
निमन्त्रय़ यथान्याय़ं विप्रांस्तस्मिन्महावने ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति