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भीष्म पर्व
अध्याय ४६
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सञ्जय़ उवाच
पक्षकोटिप्रपक्षेषु पक्षान्तेषु च वारणाः |  ५३   क
जग्मुः परिवृता राजंश्चलन्त इव पर्वताः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति