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द्रोण पर्व
अध्याय ४६
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सञ्जय़ उवाच
तं द्रौणिः पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पय़त् |  १३   क
वरं वरममित्राणामारुजन्तमभीतवत् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति