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द्रोण पर्व
अध्याय ४६
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिन्द्रोणो वाणशतं पुत्रगृद्धी न्यपातय़त् |  १७   क
अश्वत्थामा तथाष्टौ च परीप्सन्पितरं रणे ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति