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द्रोण पर्व
अध्याय ४६
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सञ्जय़ उवाच
अभिमन्युः प्रविश्यैव तावकान्निशितैः शरैः |  ३   क
अकरोद्विमुखान्सर्वान्पार्थिवान्पाण्डुनन्दनः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति