कर्ण पर्व  अध्याय ४६

युधिष्ठिर उवाच

जाग्रत्स्वपंश्च कौन्तेय़ कर्णमेव सदा ह्यहम् |  १९   क
पश्यामि तत्र तत्रैव कर्णभूतमिदं जगत् ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति