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कर्ण पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
रौक्मं रथं हस्तिवरैश्च युक्तं; रथं दित्सुर्यः परेभ्यस्त्वदर्थे |  ३४   क
सदा रणे स्पर्धते यः स पापः; कच्चित्त्वय़ा निहतस्तात युद्धे ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति