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उद्योग पर्व
अध्याय ३२
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धृतराष्ट्र उवाच
आचक्ष्व मां सुखिनं काल्यमस्मै; प्रवेश्यतां स्वागतं सञ्जय़ाय़ |  ५   क
न चाहमेतस्य भवाम्यकाल्यः; स मे कस्माद्द्वारि तिष्ठेत क्षत्तः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति