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कर्ण पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
यद्दर्पपूर्णः स सुय़ोधनोऽस्मा; नवेक्षते कर्णसमाश्रय़ेण |  ४४   क
कच्चित्त्वय़ा सोऽद्य समाश्रय़ोऽस्य; भग्नः पराक्रम्य सुय़ोधनस्य ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति