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शल्य पर्व
अध्याय ५३
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नारद उवाच
शय़ानं धार्तराष्ट्रं तु स्तम्भिते सलिले तदा |  २८   क
पाण्डवाः सह कृष्णेन वाग्भिरुग्राभिरार्दय़न् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति