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भीष्म पर्व
अध्याय ५५
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सञ्जय़ उवाच
सुदर्शनं चास्य रराज शौरे; स्तच्चक्रपद्मं सुभुजोरुनालम् |  ८९   क
यथादिपद्मं तरुणार्कवर्णं; रराज नाराय़णनाभिजातम् ||  ८९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति