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कर्ण पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
अमर्षणं निकृतिसमीरणेरितं; हृदि श्रितं ज्वलनमिमं सदा मम |  ४८   क
हतो मय़ा सोऽद्य समेत्य पापधी; रिति व्रुवन्प्रशमय़ मेऽद्य फल्गुन ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति