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कर्ण पर्व
अध्याय ४६
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युधिष्ठिर उवाच
अग्रगं धार्तराष्ट्राणां सर्वेषां शर्म वर्म च |  ५   क
रक्षितं वृषसेनेन सुषेणेन च धन्विना ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति