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द्रोण पर्व
अध्याय ५४
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सञ्जय़ उवाच
यदि च मनुजपन्नगाः पिशाचा; रजनिचराः पतगाः सुरासुराश्च |  २६   क
रणगतमभिय़ान्ति सिन्धुराजं; न स भविता सह तैरपि प्रभाते ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति