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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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जनमेजय़ उवाच
किमर्थं भगवानग्निः प्रनष्टो लोकभावनः |  १५   क
विज्ञातश्च कथं देवैस्तन्ममाचक्ष्व तत्त्वतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति