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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
देवाः सर्वे नरव्याघ्र वृहस्पतिपुरोगमाः |  १९   क
ज्वलनं तं समासाद्य प्रीताभूवन्सवासवाः |  १९   ख
पुनर्यथागतं जग्मुः सर्वभक्षश्च सोऽभवत् ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति