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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसूनि विविधानि च |  २२   क
कौवेरं प्रय़यौ तीर्थं तत्र तप्त्वा महत्तपः |  २२   ख
धनाधिपत्यं सम्प्राप्तो राजन्नैलविलः प्रभुः ||  २२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति