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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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वैशम्पाय़न उवाच
अभिषिक्तश्च तत्रैव समागम्य मरुद्गणैः |  २७   क
वाहनं चास्य तद्दत्तं हंसय़ुक्तं मनोरमम् |  २७   ख
विमानं पुष्पकं दिव्यं नैरृतैश्वर्यमेव च ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति