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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
भो भो राक्षस तिष्ठस्व सहदेवोऽस्मि पाण्डवः |  २७   क
हत्वा वा मां नय़स्वैनान्हतो वाद्येह स्वप्स्यसि ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति