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शल्य पर्व
अध्याय ४६
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जनमेजय़ उवाच
अपां पतिः कथं ह्यस्मिन्नभिषिक्तः सुरासुरैः |  ४   क
तन्मे व्रूहि महाप्राज्ञ कुशलो ह्यसि सत्तम ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति