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आदि पर्व
अध्याय ४७
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सूत उवाच
यज्ञस्याय़तने तस्मिन्क्रिय़माणे वचोऽव्रवीत् |  १४   क
स्थपतिर्वुद्धिसम्पन्नो वास्तुविद्याविशारदः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति