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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
देवसेनापतिस्त्वेवं देवसेनाभिरावृतः |  २५   क
अनुगच्छति देवेशं व्रह्मण्यः कृत्तिकासुतः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति